नर्मदा तट के तीर्थ

श्री नर्मदा मंदिर, नर्मदा की उद्गम स्थली विंध्य और सतपुड़ा पहाड़ों में अमरकंटक नाम का एक छोटा-सा गाँव हैं। उसी के पास से नर्मदा एक गोमुख से निकलती हैं। कहते हैंं, किसी जमाने में यहाँ पर मेकल, व्यास, भृगु और कपिल आदि ऋषियों ने तप किया था। ध्यानियों के लिए अमरकंटक बहुत ही महत्व का स्थान हैं। श्री नर्मदा मंदिर के निर्माण के संबंध में कोई प्रमाण नही हैं, फिर भी नर्मदा मंदिर का अस्तित्व अत्यन्त प्राचीन हैं, नर्मदा मंदिर के निर्माण के संबंध में यह कहा जा सकता हैं कि इसका निर्माण कर्चुली काल में हुआ था, बारहवीं सदी के आस-पास, नर्मदा उद्गम कुण्ड में स्थित रेवा नायक की प्रतिमा यह इंगित करती हैं कि कुण्ड का निर्माण रेवा नायक ने करवाया था। मंदिर निर्माण के कई सदी बाद नागपुर के भोसले राजाओं ने नर्मदा उद्गम कुण्ड का निर्माण कराया होगा, इसके पश्चात् जीर्ण अवस्था को देखकर महारानी अहिल्या ने उसका जीर्णोद्धार कराया। श्री नर्मदा मंदिर परिसर में 24 मंदिरों का एक विशाल समूह निर्मित हैं, जिसमें विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाऍ स्थापित हैंं। मंदिर परिसर में ही एक हाथी और एक घोडे की प्रतिमा स्थापित हैंं, जिसमें लाखन और उद्ल की प्रतिमा स्थापित हैंं, जो औरगंजेब के शासन काल में खण्डित कर दी गई थी।
सोनमूडा सोभद्र का उदगम स्थल माई की बगिया से लगभग १ कि.मी. की दूरी पर दक्षिण दिशा की ओर सोनमूडा नामक स्थान हैं। यह स्थल ब्रम्हा जी के मानस पुत्र सोन का उद्गम स्थल हैं। सोन उद्गम कुण्ड के समीप ही भद्र कुण्ड हैं, यह भद्र का उद्गम स्थल हैं। सोन-भद्र दोनो का संगम कुण्ड समीप ही हैं। संगम होने क पश्चात् ‘सोनभद्र एक नया नाम बनकर आगे प्रवाहित होते हैं। इस संगम कुण्ड से लगभग १५० मीटर की दूरी पर सोनभद्र जल प्रपात हैं, जिसकी ऊंचाई लगभग ३०० फीट हैं।
माई की बगिया श्री नर्मदा मंदिर से पूर्व दिशा की ओर लगभग १ किमी की दूरी पर माई की बगिया नामक मनोरम स्थल हैं, जिसे चरणोदक कुण्ड के नाम से भी जाना जाता हैं माई की बगिया स्थान के सन्दर्भ में एक जन श्रुति प्रचलित हैं कि श्री नर्मदा जी बाल्यकाल में इसी बगिया में अपनी सखी गुलाबकावली के साथ क्रीडा किया करती थी (गुलाबकावली एक प्रकार का पौधा हैं, जो जनश्रुति के अनुसार पूर्वकाल में सुन्दर कन्या के रूप में थी तथा श्री नर्मदा जी की सहेली थी) इसी कारण इस स्थान का नाम माई की बगिया पडा।
कपिलधारा श्री नर्मदा मंदिर से पश्चिम दिशा की ओर लगभग ०६ किमी की दूरी पर कपिलधारा नामक स्थान हैं। इस स्थान पर श्री नर्मदा जी का प्रथम जल प्रपात बडे प्रचंण्ड वेग से लगभग १०० फीट की ऊंचाई से गिरता हैं। इस स्थान पर श्री नर्मदा जी की जलधारा की चौडाई लगभग २० फीट हैं।
दूधधारा कपिलधारा से पश्चिम दिशा की ओर लगभग १ किमी की दूरी पर दूध धारा नामक जल प्रपात हैं। यह श्री नर्मदा जी का द्वितीय जल प्रपात हैं। यह जल प्रपात घने वनों के मध्य में अविस्मरणीय, आकर्षक, मनोरम छटा उपस्थित करता हैं। इस जल प्रपात की ऊंचाई लगभग १० फीट हैं।
प्राचीन करणमठ ई. 1661 के पश्चात् कलचुरी शासकों के विषय में जानकारी का अभाव हैं। कलचुरी इतिहास से ज्ञात होता हैं कि गांगेय देव तथा कर्ण के समय अमरकंटक का क्षेत्र अत्यन्त विकसित हुआ, क्योंकि कर्ण भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली, कुशल शासक माना गया हैं। पूर्व के वषों के आधार पर ऐसा प्रतीत होता हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन समय मे अत्यन्त समृद्धिशाली धार्मिक क्षेत्र रहा होगा। कलचुरी गांगेयदेव तथा कर्ण का समय स्थापत्य का समय माना जाता हैं। यहॉं निर्मित मंदिरों में कलात्मकता देखने को मिलती हैं, परन्तु साधारण अंतकरण हैं। इन प्राचीन मंदिरों का निर्माण कलचुरी काल में लगभग 1042 ई. में चेदी राजा कर्णदेव के द्वारा कराया गया था।
श्री पातालेश्वर महादेव प्राचीन मंदिरों में पातालेश्वर महादेव का मंदिर हैं। जनश्रुतियों के अनुसार इस मन्दिर की स्थापना आदि जगतगुरू शंकराचार्य जी ने की थी। पातालेश्वर महादेव का मंदिर विशिष्ट प्रकार से बना हुआ हैं। पातालेश्वर का मंदिर अपने नाम के अनुरूप ही पाताल में स्थित हैं। कहने का तात्पर्य हैं कि शिवलिंग पृथ्वी की सतह से लगभग 10 फिट की गहराई में स्थित हैं। प्रतिवर्ष पातालेश्वर शिवलिंग जलहरी मे श्रावण मास के अंतिम सोमवार के दिन श्री नर्मदा का प्रादुर्भाव होता हैं और शिवलिंग के ऊपर तक जल भर जाता हैं । यह आश्चर्यजन बात हैं तथा समझ से परे भी हैं। ऐसी मान्यता हैं कि श्री नर्मदा शिवजी को स्नान कराने आती हैं। ऐसा केवल श्रावण मास मे होता हैं, अन्य समय चाहे कितनी भी वर्षा क्यों न हो, इस प्रकार की घटना नहीं होती।
श्री विष्णु मंदिर अमरकंटक
धूनी पानी भृगु कमण्डल के पास ही श्री नर्मदा मंदिर से लगभग 4 किमी की दूरी पर धून पानी नाम से एक स्थान स्थित हैं। कहा जाता हैं कि नर्मदा जी के किनारे एक साधु आकर अपनी साधना कर रहे थे। साधना के दौरान ही उनके धूनी के स्थान से जल निकला और धूनी को शांत कर दिया था, इस कारण उस स्थान का नाम धूनी पानी पडा। आज भी यहॉ पर एक कुण्ड, साधु का स्थान एवं बगीचा स्थित हैं।
कबीर चबूतरा आश्रम श्री नर्मदा मंदिर से पश्चिम दक्षिण दिशा की ओर लगभग 5 किमी की दूरी पर कबीर चबूतरा नामक स्थान हैं। श्री नर्मदा परिक्रमा जो लोग अमरकंटक से आरम्भ करते हैंं, वे श्री नर्मदा के दक्षिण तट से चलते हुये पांच किमी की दूरी पर कबीर चबूतरा नामक स्थान पर पहुंचते हैं। पुरानी मान्यता हैं कि किसी समय देश के महान संत श्री कबीरदास जी ने इसी स्थान पर तप किया था, सिद्धि भी उन्हे इसी स्थान पर प्राप्त हुई थी। इसी कारण ये स्थान कबीर पंथियों के लिये श्रद्धा का विशेष् केन्द्र बना हुआ हैं। संत कबीर की आत्म चिंतन स्थली घनघोर जंगलों के मध्य सुन्दर स्थान पर स्थित हैं। इसी स्थान पर कबीर कुण्ड बना हुआ हैं, कबीर कुण्ड के विषय में कहा जाता हैं कि श्री नर्मदा प्रात:काल लगभग 6 से 9 बजे तक दुग्ध धारा बनकर इस कुण्ड में दर्शन देती हैं।
धरमपानी काली माता मंदिर श्री नर्मदा मंदिर से लगभग 3 किमी की दूरी पर पश्चिम दिशा की ओर एरण्डी संगम नाम गर्भहत्या के पाप को दूर करने वाला पुण्य तीर्थ धाम हैं। इस तीर्थ के संदर्भ मे कहा जाता हैं। जो मनुष्य एरण्डी नदी के नदी के पवित्र संगम क्षेत्र में मृत्यु पाते हैंं वे हजारों युग तक रूद्रलोक मे निवास करते हैंं। इस स्थान पर दिन-रात निवास कर वैदिक ग्यारह नाम वाले एवं रूद्र वाले वैदिक मंत्रों का जाप करें तो उत्तम गति पाते हैंं। विद्यार्थी विद्या पाता हैं, धन चाहने वाला धन, पुत्र चाहने वाला पुत्र आदि मनोरथ पूर्ण होते हैंा। एरण्डी और श्री नर्मदा के संगम के निर्मल जल के स्नान कर मनुष्य महापापी होकर भी उत्तम गति पाता हैं।
भृगु कमण्डल नर्मदा मंदिर से लगभग 1 कि.मी. की दूरी पर स्थित हैं ।
श्री बर्फानी आश्रम नर्मदा मंदिर से पूर्व दिशा की ओर लगभग 100 मीटर की दूरी पर स्थित हैं|
श्री यंत्र मंदिर नर्मदा मंदिर से आधा कि.मी. की दूरी पर दक्षिण दिशा की ओर घने वनों के मध्य श्री यंत्र महामेरू मंदिर का निर्माण कार्य स्वामी श्री सुकेन्द्रवानन्द जी महाराज द्वारा कराया जा रहा हैं। श्री यंत्र महामेरू मंदिर की लम्बाई, चौडाई और ऊचांई 52 फीट हैं। इस मंदिर की तुलना श्री जगन्नाथ, श्री रामेश्वरम् श्री बद्रीनाथ और श्री द्वारिका पीठ से की जा सकती हैं, जो विश्व के मंदिरों मे अपना विशेष स्थाना रखते हैं। महर्षि अगस्त द्वारा उपादष्टि मंदिर का आधार पदमवध पद हैं। शास्त्रों के अनुसार पदमवध का अर्थ होता हैं ज्ञान। इसका उचित अर्थ हम ज्ञान के आधार पर निर्मित मंदिर से लगा सकते हैं। सार्द्ध कोटि तीथ्रषु स्त्रात्वा यत फलमश्रुते, लभते भक्तया त्या श्री चक्र दर्शनम्। अर्थ - पचास लाख तीर्थो में स्नान करने से जो पुण्य फल प्राप्त, वहीं फल भक्तिपूर्वक श्री यंत्र के दर्शनमात्र से प्राप्त होता हैं
कल्याण आश्रम नर्मदा मंदिर से पश्चिम दिशा की ओर लगभग 1 कि.मी. की दूरी पर स्थित हैं ।
मृत्युंजय आश्रम युगावतार परमपूज्य संत श्रीमंत परमहंस परिब्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रहानिष्ठ श्री स्वामी एकरसानन्द जी महाराज ने सर्वभूतहिते रता: को साकार करते हुये दैवी सम्पद् मंण्डल के उन्नयन एवं विकास हेतु मेकल पर्वत अमरकंटक में मॉ नर्मदा के उद्गम स्थल में परमपूज्य महाराज श्री स्वामी एकरसानन्द जी महाराज ने अपने इष्टदेव मृत्युंजय भगवान के नाम से मृत्युंजय आश्रम की स्थापना की। आध्यात्मिक शिक्षा एवं चरित्र निर्माण के अनुपम केन्द्र – इस आश्रम में नित्य प्रार्थना, विश्वेश्वर भगवान की रूद्राभिषेक, सतसंग , प्रवचन, भगवती नर्मदा की आरती, नर्मदाष्टक तथा शिवमहिम्न स्त्रोत का सामूहिक पाठ होता हैं। निर्धन छात्रों के आवास एवं भोजन व्यवस्था के साथ ही गौसेवा पर विशेष ध्यान दिया जाता हैं। अनेक सेवा कार्यो के साथ ही परिक्रमावासियों की सेवा में आश्रम अग्रणी भूमिका निभा रहा हैं।
शान्ति कुटी नर्मदा मंदिर से पश्चिम दिशा की ओर लगभग 1 कि.मी. की दूरी पर स्थित हैं ।
श्री आदिनाथ जैन मंदिर नर्मदा मंदिर से उत्तर दिशा की ओर लगभग 1 कि.मी. की दूरी पर स्थित हैं ।
शंकराचार्य आश्रम नर्मदा मंदिर से दक्षिण दिशा की ओर लगभग 200 मी की दूरी पर स्थित हैं
अमरनाथ घाट ग्राम फर्रीसेमर पोस्ट पोडकी वि.ख. पुष्पराजगढ जिला अनूपपुर|
बेलघाट ग्राम नवाटोला पोस्ट खाटी वि.ख. पुष्पराजगढ जिला अनूपपुर|
रामघाट ग्राम पडरिया पोस्ट खाटी वि.ख. पुष्पराजगढ जिला अनूपपुर|
सिवनी संगम घाट ग्राम सिवनीसंगम पोस्ट दमेहडी वि.ख. पुष्पराजगढ जिला अनूपपुर|
तुलसीघाट ग्राम ठाडपाथर पोस्ट धवगढ वि.ख. पुष्पराजगढ जिला अनूपपुर|
चन्दनघाट ग्राम पोस्ट कच्छराटोला वि.ख. पुष्पराजगढ जिला अनूपपुर|
दूधी घाट ग्राम दूधी पोस्ट तुलरा वि.ख. पुष्पराजगढ जिला अनूपपुर|

अरंडी संगम अरंडी संगम अमरकंटक कपिलधारा रोड पर स्थित हैं। यहां पर श्री 1008 योगीराज स्वामी सीताराम दास महाराज का स्थानीय आश्रम बना हुआ हैं। अरंडी नदी एवं नर्मदा नदी का यह संगम स्थल हैं। जो कि योग साधना के लिये अति उत्तम हैं।
चक्रतीर्थ कपिलधारा रोड वि.ख. करंजिया
बाबाघाट बाबाघाट कपिलधारा रोड पर स्थित हैं। यहां पर नर्मदा बालस्वरूप में छोटी धारा के साथ प्रवाहित होती हैं। बाबाघाट में कबीर सत्यानुसंधान न्यास आश्रम बना हुआ हैं यहां विगत 60 वर्षो से साधु बाबा निवासरत् हैं जिससे इसका नाम बाबाघाट रखा गया हैं, तथा नर्मदा परिक्रमावासी यहां पर भोजन विश्राम हेतु रूकते हैं।
कपिलधारा जल प्रपात अमरकंटक से 05 किमी दूर पश्चिम दिशा पर स्थित हैं। यहां प्राचीन समय में कपिलमुनि ने तपस्या की थी इसलिये नर्मदा नदी के इस जलप्रपात को कपिलधारा के नाम से जाना जाता हैं यह धारा पूरे समय प्रवाहित रहती हैं, एवं उपर से नीचे लगभग 80 फीट नीचे जल का प्रपात होता हैं।
रामघाट ग्राम हर्राटोला वि.ख. कंरंजिया
भीमकुंडी भीमकुंडी वि.ख.करंजिया
सिवनी संगम गोरखपुर वि.ख. कंरजिया
शिवालय घाट मजियाखार शोभापुर वि.ख. बजाग
चंदनघाट ग्राम शुकुलपुरा वि.ख. बजाग
नर्मदाघाट मढियारास वि.ख. डिण्डौरी
ऋणमुक्तेश्वर मंदिर कुकर्रामठ कुड़ा रोड वि.ख. समनापुर
रामघाट जिला मुख्यालय से 7 किमी अमरकंटक रोड के बाई ओर रामघाट उत्तर दिशा में एवं लक्ष्मण मंडवाघाट दक्षिण दिशा में स्थित हैं। यहां पर नर्मदा नदी के बीचों बीच टापू बना हुआ हैं तथा दो धाराओं में नदी प्रवाहित हैं। जो कि पर्यटन का केन्द्र हैं साथ ही पौराणिक दृष्टि से श्रीराम जी विद्या अध्ययन के पश्चात् तीर्थ सेवन हेतु यहां आये थे तथा उत्तर दिशा के घाट में रूके थे। जिसे रामघाट के नाम से जाना जाता हैं। इसी तरह दक्षिण घाट में लक्ष्मण जी का मंडप था। इसलिये इसे लक्ष्मण मंडवा घाट कहते हैं। मकर संक्रात्रि एवं नर्मदा जयंती पर मेला लगता हैं।
डेमघाट काशीघाट डिण्डौरी नगर का मुख्य डेमघाट/काशीघाट नर्मदागंज उत्तर एवं दक्षिण तट में स्थित हैं। यहां पर नर्मदा जी, विठ्ठल जी का मंदिर एवं खैरमाई शिव जी का प्राचीन मंदिर, राठौर एवं बिलैया धर्मशाला हैं। यहां पर मकर सक्रांति, शिवरात्रि एवं नर्मदा जयंती पर मेला लगता हैं। तथा प्रतिदिन 1000 से अधिक लोग स्नान करते हैं। साथ ही नर्मदा परिक्रमावासियों के ठहरने हेतु धर्मशाला तथा सदावृत चलता हैं।
जोगीटिकरियाण् जबलपुर रोड वि.ख. डिण्डौरी
देवनाला देवनाला डिण्डौरी जिला मुख्यालय से 23 किमी दूर अमरपुर विकासखंड के सक्का से लगे हुये खैरदा रोड़ पर देवनाला स्थापित हैं। यहां चट्टानों से 50 फीट नीचे जल की धारा निरंतर प्रवाहित रहती हैं। और शिवजी के शिवलिंग के उपर आकर गिरती हैं। यहां शिवरात्रि में मेला लगता हैं। यह क्षेत्र अध्यात्म एवं योग के लिये प्रसिद्ध हैं।
कुकर्रामठ यह मंदिर डिण्डौरी जिला मुख्यालय से 13 किमी दूर अमरकंटक रोड किनारे ग्राम कुकर्रामठ में स्थापित हैं। कुकर्रामठ मंदिर ऋणमुक्तेश्वर महादेव जी का हैं जो कि 11 वी शताब्दी में बनाया गया था। इतिहास में वर्णित हैं कि आदि शंकराचार्य जी ने संसार से ऋणमुक्त होने के लिये ऋणमुक्तेश्वर महादेव शिवलिंग की स्थापना की थी। साथ ही दूसरी किद्वंती हैं कि कुत्ते की स्वामी भक्ति से प्रेरित होकर यह कुकर्रामठ निर्माण किया गया था।
मालपुरण् कनै नदी संगम ग्राम मालपुर वि.ख. शहपुरा
कुटरई ग्राम कुटरई वि.ख. मेंहन्दवानी

सहस्त्रधारा नर्मदा का पहला बडा पड़ाव मंडला हैं, जो अमरकंटक से लगभग 295 किमी की दूरी पर नर्मदा के उत्तरी तट पर बसा हैं। सुंदर घाटों और मंदिरों के कारण यहाँ पर स्थित सहस्रधारा का दृश्य बहुत सुन्दर हैं। कहते हैंं कि राजा सहस्रबाहु ने यहीं अपनी हजार भुजाओं से नर्मदा के प्रवाह को रोकने का प्रयत्न किया था इसीलिए असका नाम सहस्रधारा हैं।
रंगरेजघाट यह मण्डला का सबसे प्राचीन पक्का घाट हैं यहां पहले रगंरेज रंगाई का कार्य किया करते थे इसलिए रंगरेज घाट के नाम से जाना जाता हैं।
हनुमानघाट यह घाट स्वामी सीताराम जी की तपो स्थली हैं यहां सीताराम जी की समाधि स्थल व सिद्ध हनुमान मंदिर हैं।
शिवानंद आश्रम इस आश्रम निर्माण दक्षिण भारत के एक संत ने निर्माण किया था इसलिए इस घाट का नाम शिवानंद आश्रम हैं परिक्रमावासियो के लिए भोजन एवं विश्राम की व्यवस्था हैं।
बेंलघाट आश्रम यह घाट सिंगारपुर पंचायत में स्थित हैं यहां बेल के वृक्षो की बाहुल्यता हैं इस कारण इसे बेलघाट कहते हैं। यहा रामभारती संत परिक्रमा वासियो के सेवा के लिए रहते हैं।
श्रृंग ऋषि आश्रम सिंगारपुर- यहां श्रृंग ऋषि ने तपस्या की थी उन्हें नर्मदा जी ने दर्शन दिये थे, बहुत समय तक तपस्या करते करते उनके सींग निकल आये थे, तब से इस ग्राम का नाम सिंगारपुर पडता हैं।
जगदम्बनी आश्रम देवगांव- भगवान परशुराम जी ने यहां तपस्या की थी व जमदागिनी ऋषि ने भी यहां तपस्या की थी इसलिये इसे जगदम्बनी आश्रम से जानते हैं यहां बुढनेर व नर्मदा जी का संगम हैं
रामनगर महल रामनगर
श्रीमोहनबाबा आश्रम एक मोहनबाबा संत थे जिनका स्वर्गवास हो गया हैं उनके माध्यम से वहां पर आश्रम बनाया गया था जो नर्मदा घाट से लगा हुआ हैं। जो श्रद्धा का केन्द्र बिन्दु हैं।
कूम्हाघाट आश्रम कूम्हा- श्री श्री 1008 बालकदास जी का आश्रम हैं, यहां पर परिक्रमावासी आते हैं, यह धार्मिक स्थान हैं
चिरईडोंगरी आश्रम चिरईडोंगरी- यहां पर 500 वर्ष पुराना पीपल के पेड के नीचे महादेव की प्राचीन प्रतिमा स्थापित होने के कारण विख्यात हैं
इंजीनियरबाबा आश्रम भावल- श्री श्री 1008 ब्रहमचर्य जी महाराज की तपोस्थली हैं, भगवान राम सीता की प्राचीन मूर्ति स्थापित होने के कारण प्रचलित हैं
चिरीकुटी आश्रम चिरीबम्हनी- यहां पर प्राचीन राधा कृष्ण की मूर्ति स्थापित होने के कारण यहा पर इस आश्रम का नाम चिरीकुटी रखा गया, यहां श्रद्धालू आते हैं
फक्कडबाबा आश्रम खम्हरिया- प्राचीन दुर्गा मंदिर तथा फक्कडबाबा जी ने नर्मदा तट पर तपोस्थली हैं
मूलडोंगरी घाट पिण्डरई- यहां नर्मदा नदी का घाट हैं, यहां सक्रांति में मेला लगता हैं, दूर- दूर से लोग यहां स्नान करने आते हैंं
सांगवा आश्रम सांगवा- यहां नर्मदा जी का प्राचीन मंदिर हैं, यहां परिक्रमावासी आते रहते हैंं
बेरपानी घाट बेरपानीदेवरी- यहां नर्मदा जी का प्राचीन मंदिर हैं, यहां परिक्रमावासी आते रहते हैंं
मैलीघाट बुदरापिपरिया- यहां नर्मदा नदी का घाट हैं, यहां सक्रांति में मेला लगता हैं, दूर- दूर से लोग यहां स्नान करने आते हैंं

नागा बाबा का आश्रम तीर्थ यात्री के लिये बीजासेन
मोनीमाई आश्रम तीर्थ यात्री के लिये माँ नर्मदा के तट पर स्थित यह ग्राम मौनी माई के आश्रम व माँ नर्मदा के पवित्र प्राकृतिक घाट वाला धार्मिक स्थल हैं यहा परिक्रमा वासियो के अलावा विदेशी सैलानी भी शोध कार्य से आते हैं कहते हैं इस क्षेत्र के आसपास माँ नर्मदा के जल मे वो लवण पाया जाता हैं जिसमे लकड़ी एवं मृत जीवो को जीवाश्म शैल मे बदलने की क्षमता हैं ।
मंदिर व घाट पिपरिया
मंदिर देवी नर्मदा जी का मंदिंर छपपल
कलकुही घाट माँ नर्मदा के पावन तट पर स्थित यह ग्राम क्षेत्र के प्रमुख पर्यटन स्थल मे से हैं यहा विशाल प्राकृतिक घाट हैं मकर सक्रांति के दिन यहा हजारो की संख्या मे लोग स्नान के लिए आते हैं और यहां मेला लगता हैं किन्तु यहां पर्यटक वर्ष भर माँ नर्मदा के प्राकृतिक सौंदर्य को देखने के लिए आते हैं माँ नर्मदा का सबसे शुद्ध नीर इसी स्थान से गांगदा ग्राम के मध्य पाया गया हैं
टिकरिया का मंदिर खजरी गंगई
माता जी का आश्रम ब्यौहारी

पंचवटी (भेडाघाट) यह स्थान जबलपुर से 19 किमी पर स्थित हैं। किसी जमाने में भृगु ऋषि ने यहाँ पर तप किया था। उत्तर की ओर से वामन गंगा नाम की एक छोटी नदी नर्मदा में मिलती हैं। इस संगम अर्थात भेड़ा के कारण ही इस स्थान को भेड़ा-घाट कहते हैं। यहाँ थोड़ी दूर पर नर्मदा का एक धुआँधार प्रपात हैं। धुआँधार के बाद साढ़े तीन किमी तक नर्मदा का प्रवाह दोनों ओर सौ-सौ फुट से भी अधिक ऊँची संगमरमरी दीवारों के बीच से सिंहनाद करता हुआ गुजरता हैं।
चौसठ जोगनी (भेडाघाट) चौसठ जोगनी (भेडाघाट)- चौसठ जोगनी में शिवपार्वती जी की विवाह की प्राचीन मूर्ति हैं । मंदिर के चारो तरफ माता यक्षिणी के चौसठ खण्डित मूर्तियां हैं । इन मूर्ति को मुगलसराय के राजा औरंगजेब से खण्डित किया था ।
धुआंधार धुआंधार- जबलपुर में मां नर्मदा का तीर्थस्थल हैं यहां संगमरमर की चट्टानें के बीच से मां नर्मदा का धाराप्रवाह हैं जिसे धुआंधार कहते हैं।
तिलवारा तिलवारा - तिलवाराघाट में मां नर्मदा के ऊपर से पुल बना हुआ हैं और पूल के नीचे शानिधाम हैं यहां पर भी मां नर्मदा की आरती की जाती हैं और मकरसंक्राति के दिन मेला भरता हैं ।
ग्वारीघाट ग्वारीघाट - ग्वारीघाट में मां नर्मदी नदी के बीच में मां नर्मदा माता का मंदिर हैंं और नर्मदा के उस पर गुरूद्वारा हैंं जहां दैनिक लंगर चलता हैं । ग्वारी घाट में हर घाट को व्यवस्थित रूप से बनाया गया हैंं यहां बहुत सारे विभिन्न प्रकार प्रचीन मंदिर हैंं । यहां दैनिक मां नर्मदा जी की शाम भव्य आरती का आयोजन किया जाता हैंं । एवं मकरसंक्राति के दिन एवं शरद पूर्णिमा के दिन मेले का आयोजन किया जाता हैंं ।

झांसीघाट झांसीघाट नरंसिंहपुर व जबलपुर नर्मदा सीमा पर रेवा तट चंद्र मोलेश्वर महादेव जी का स्थान हैं यहां अंग्रेजी शासन काल में लकडी का पुल एवं चैकी स्थापित थी वर्तमान में मकर सक्रांती, अमावश्या व पूर्णिमा एवं नर्मदा जयंती पर मेला लगता हैं।
बरमकुण्ड ब्रम्हकुण्ड में ब्रम्हा जी की तपो भूमि हैं एवं नर्मदा जी का मंदिर हैं।
महादेव पिपरिया ग्राम महादेव पिपरिया में महादेव भगवान का अति प्राचीन मंदिर लगभग 200 वर्ष पुराना स्थित हैं जिसमें जबरेश्वर नाथ नाम से विशाल प्राकृतिक शिवलिंग स्थापित हैं यहां मकर सक्रांती , अमावश्या व पूर्णिमा एवं नर्मदा जयंती पर मेले का आयोजन किया जाता हैं। इस मंदिर की प्रतिमा को लेकर मान्यता हैं कि यह प्रतिमा प्राकृतिक रूप से अपना स्वरूप व आकार बढाती जाती थी जिसे खील लगाकर बढने से रोका गया।
करहैंया नर्मदा बताया जाता हैं कि ग्राम करहैंया के नर्मदा घाट में करध्वज ऋषि द्वारा तपस्या की गई थी जिसमें उन्हे मां नर्मदा द्वारा ज्ञान की प्राप्ति हुई उसी के पश्चात से वहा स्थित ग्राम का नाम करध्वज ऋषि के नाम पर करहैंया गांव पड़ गया।
हीरापुर ग्राम हीरापुर में स्थित संघमेश्वर महादेव मंदिर अति प्राचीन हैं बताया जाता हैं कि इसकी स्थापना लगभग 300 वर्ष पूर्व की गई थी अति प्राचीन मंदिर होने के कारण नर्मदा यात्री एवं आस-पास के लोगों में यह आस्था का केन्द्र प्रसिद्ध हैं।
समनापुर निरांकारी आश्रम हैं। शंकर जी का प्राचीन मंदिर हैं।
चिनकी चिनकी घाट में अमावश्या, पूर्णिमा एवं नर्मदा जयंती पर मेले का आयेाजन होता हैं। जिसमें बहुत श्रद्धालु स्नान हेतु एकत्रित होते हैं।
बरमान कला बरमान कला में प्राचीनतम मंदिर शिवालय एवं गणपति का मंदिर, श्रीचिन्त देवी का मढिया, गरूड़ स्तंभ, गौरी शंकर लक्ष्मीनारायण मंदिर, नया जैन मंदिर, हरदौल खेरापति मठ (बड़ी मढि़या), चित्रगुप्त मदिर, सोमेश्वर महादेव, देव दत्रात्रेय मंदिर, श्रीराम जानकी मंदिर, श्री देव राधा मनमोहन का मंदिर,हैं यहां मकर सक्रांती में 15 दिवसीय के साथ-साथ, आमवश्या, पूर्णिमा एवं नर्मदा जयंती पर मेला का आयोजन होता हैं।
बरमान खुर्द 6वी शताब्दी का रानी दुर्गावती का प्राचीनतम मंदिर हैं जिसके बाहर बारह प्रतिमाए हैं। शारदी देवी का मंदिर हैं नर्मदाजी के इस तट को रेत घाट के नाम से जाना जाता ह। मकर सक्रांती पर 1 मास मे पूरे नर्मदा तट पर लगने वाले सभी मेलो में सबसे बडे मेले का आयोजन होता हैं।
हीरापुर नर्मदा के उत्तरी तट व नरसिंहपुर व रायसेन की सीमा में स्थित श्री स्वामी षड़मुखानंद जी की तपोस्थली हैं यहां राजराजेश्वरी जी का भव्य मंदिर स्थापित हैं।
लिंगा सतधारा एवं सूर्यकुण्ड के नाम से प्रसिद्ध हैं यहां पर मां नर्मदा जी की सात धाराये स्पष्ट देखी जा सकती हैं। सूर्यकुण्ड की ऐसी मान्यता हैं कि कोई चर्म रोगी यदि उसमें स्नान करता हैं तो उस रोग से उसको निदान प्राप्त होता हैं।
बिल्थारी यह राजा बलि की तपोस्थली का स्थान हैं यहां मकर सक्रांती पर्व पर 07 दिवस का मेला आयोजित किया जाता हैं।
सोकलपुर सोकलपुर पतई घाट में स्वामी हैं जो तपस्या 15 साल से अन्न त्याग कर केवल मां नर्मदा जी जल ग्रहण कर रहे हैं और नशा मुक्ति के लिए प्रसिद्ध हैं। सोकलपुर के स्वामी के द्वारा नीलकुंठ घाट पर भव्य मंदिर का निर्माण करवा रहे हैं।
खकरिया राज राजेश्वरी मंदिर बना हैं तथा यहां ककरा महाराज जी ने तपस्या की जिसके कारण ग्राम का नाम खकरिया हुआ तथा ककरा महाराज जी का मंदिर हैं।
किरखेडा माता अनुसाईया का आश्रम एवं तपोभूमि हैं।
पीपरपानी (सोनादाह) थडे सिंह महाराज द्वारा जल समाधि ली गई कहा जाता हैं कि मां नर्मदा के अंदर सोने का मंदिर बना हैं।

गोंदागांवमठ यह मठ हरदा जिले से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं जो कि विकासखंड टिमरनी में आता हैं। अंग्रेजों के जमाने से पूर्व जब राजाओं का शासन हुआ करता था तब से इस मठ का उल्लेख पुस्तकों में मिलता हैं। इस मठ में तत्कालीन राजा द्वारा किए गए शेर के शिकार के अवशेष आज भी रखे हुए हैं जिनको देखा जा सकता हैं। इस मठ के महंतश्री शिवनारायण गिरीजी हैं।
चीचोटकुटी यह कुटी हरदा जिले से 35 किलोमीटर की दूरी पर हैं जो कि टिमरनी विकासखंड में आता हैं। यहां हिंदू धर्म पर लिखी गई देश-विदेश की विभिन्न भाषाओं की पुरातन लायब्रेरी हैं। जिसको अध्ययन करने के लिए शोधार्थी देश-विदेश से आते हैंं। इस कुटी के संस्थापक ब्रह्मलीन श्रीहनुमानदासजी महाराज हैं।
हंडिया यह इस क्षेत्र का प्रमुख आस्था का केंद्र हैं जो कि हरदा जिले से 20 किलो मीटर दूर हैं कहा जाता हैं नर्मदा यह स्थल मां नर्मदा का नाभि स्थल हैं। यहां रिद्धनाथ मंदिर हैं ओर दूसरे किनारे पर प्रसिद्ध तीर्थ स्थल नेमावर हैं जो कि देवास जिले में आता हैं।

रेवा बनखेड़ी घाट प्राचीन रामजानकी मंदिर
सूरजकुंड घाट प्राचीन शिव पार्वती मंदिर दिन में मूर्ति तीन बार अपना रूप बदलती हैं।
बांद्राभान घाट सतपुडा अभ्यारण्य देनवा नदी
सेठानी घाट यहाँ पहले जो गाँव था, उसका नाम नर्मदापुर था। इस गाँव को होशंगशाह ने नए सिरे से बसाया था। यहाँ सुंदर और पक्के घाट हैं, सूरज की पहली किरण पड़ती हैं। अधिकमास में मेला लगता हैं।
खरखेड़ी घाट तवा व नर्मदा नदी का संगम स्थल।
ऑवली घाट नर्मदा नदी पर सेठानी पुतली बाई द्वारा निर्मित कराया गया प्राचीन घाट हैं।

ओंकारेश्वर/ ममलेश्वर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्यपदेश के प्रसिद्ध शहर इन्दौर के समीप स्थित, जो इन्दौर से 75 कि. मी दूरी पर एवं ख्ण्डवा से 75 कि. मी पर स्थित हैं |यह शिवजी का चौथा प्रमुख ज्योतिर्लिंग के दो रूपो ओंकारेश्वर और ममलेश्वर की पूजा की जाती हैं ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग को शिव महापुराण मे परमेश्वर लिंग कहा गया हैं| जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित हैं उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती हैं और पहाडी के चारो ओर नदी बहने से यहा ऊं का आकार बनता हैं | ऊं शब्द की उत्पत्ति ब्रम्हा के मुख से हुई हैं इसलिए धार्मिक शास्त्रों या वेदो का पाठ ऊं क साथ ही किया जाता हैं| यह ज्योतिर्लिंग ओंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए हैं इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता हैं
सिगाजी समाधि स्थल मध्य प्रदेश के निमाड क्षेत्र मे सत सिगाजी के नाम से प्रसिद्ध धार्मिक स्थल हैं जिसमे क्षेत्रवासियो के मन मे बडी आस्था हैं यहा लोगों की मनोकामना पूर्ण होती हैं| जिला खण्डवा विकासखण्ड हरसूद की पहचान संत सिगाजी धार्मिक स्थल से होती हैं खडवा से 35 किमी. ग्राम बीड से 06 किमी दूरी ग्राम सिगाजी पुनर्वास स्थल हैं जो संत सिगाजी की समाधि स्थल हैं सिगाजी महाराज का समाधि स्थित इंदिरा सागर परियाजेना के डूब क्षेत्र मे आने के कारण उस स्थल को 50 व 60 फुट के परकोटो से सुरक्षित कर उपर कर मदिर निमार्ण किया गया| संत सिगाजी महाराज का जन्म 1576 मे गुरूवार के दिन म प्र के बडवानी जिले मे एक सम्पनं गवली परिवार मे हुआ| इनके पिता भीम जी एवं माता का गोरी बाई था तथा पत्नी का नाम जसोदा था
प्रमुख गुरू पूर्णिमा के पावन पर्व पर धार्मिक समाधि स्थल पर निशान चढाने पैदल यात्रा करके पहुचते इन पद पैदल यात्रियो को भोजन देने हेतु जगह-जगह पर निशुल्क जलपान की व्यवस्था स्थानीय ग्रामीण व एन जी ओ, समाज सेवी द्वारा किया जाता हैं धार्मिक स्थल के पास गौशाला पर कुछ लोगो के रूकने की भी व्यवस्था की जाती हैं जो पूर्णत निशुल्क होती हैं
संत सिगाजी ने श्रावण शुक्ल मे नवमी के दिन देह त्याग दी इस दिन से शरद पूर्णिमा को सत सिगाजी का मेला प्रारंभ होता हैं जो लगभग 15 दिन चलता हैं| मंदिर मे मुख्य रूप से नारीयल चिरौजी एवं गाय का शुद्ध दूध प्रसाद के रूप मे चढाया जाता हैं मेले मे लगभग 1 लाख से ज्यादा श्रदालु दर्शन करते हैं

महेश्वर किला महादेव ने असुर शक्तियों का नाश किया व संगम क्षैत्र के आसपास दिव्यमान रहने लगे तभी से संगम पर महेश्वर शिवालय विंदयवासिनी के पूर्व में कालेश्वर शिवालय, पश्चिम में ज्वालेश्वर शिवालय स्वयंभू स्थापित हैं। जिससे ये क्षैत्र महेश्वर कहलाया। उपरान्त त्रेतायुग में हैं, हैं वंशी राजा महिष्मान ने महिष्मती राज्य की स्थापना कर महेश्वर को राजधानी बनाया और इसका नाम माहिष्मती कर दिया कलयुग में जब जगतगुरू शंकराचार्य का सास्त्रार्थ हुआ उपरान्त माहिष्मती से महेश्वर हुआ। वर्तमान में यह नर्मदा किनारे का प्रसिद्ध पर्यटन एवं तीर्थ स्थल हैं।
शालीवाहन मंदिर शालीवाहन मंदिर की स्थापना शालीवाहन राजा ने की थी यह मंदिर नर्मदा जी के पानी से चारो ओर से घिरा रहता था इसे स्वर्ण मंदिर के नाम से भी जाना जाता था वर्तमान में मंदिर के आश्रमों में परिक्रमावासीयों के रूकने की व्यवस्था हैं एवं तीज ज्यौहारों पर आसपास के ग्रामीणजन दर्शन लेने आते हैं।
सहस्त्र धारा मान्यता हैं कि राजा सहस्त्र भाहु ने परशुराम जी से युद्ध के दौरान नर्मदा जी को अपने हाथो से रोक लिया था परन्तु नर्मदा जी राजा सहस्त्र भाहु के हाथो की उंगलियों के पोर के मध्य से धारा के रूप में बहने लगी इस कारण इस स्थान को सहस्त्र धारा के नाम से जाना जाता हैं। वर्तमान में यहां राष्ट्रीय स्तर की सलालेम प्रतियोगिताओं का आयोजन होने लगा हैं।
गंगातखेड़ी गंगातखेड़ी गांव के पास नर्मदा के बीचो बीच चबुतरे पर शिवलिंग स्थापित हैं। मान्यता हैं कि यहां नर्मदा जी गंगा दशहरे के दिन पूर्व वाहिनी होकर बहती हैं एवं वहां पर मेले का आयोजन होता हैं।
पेशवा बाजीराव की समाधि पेशवा बाजीराव प्रथम. सक्षिप्त जीवनी. 1. जन्म - सन् 1700 पिता – बालाजी विश्व नाथ, पेशवा बने 1720, स्वर्गवास अप्रैल 1740 स्थान रावेर खेड़ी । दक्षिण से दिल्ली तक धाक जमा देने वाला महान मराठा सेनापती. 2. विजय का विवरण – मालवा, गुजरात, दक्षिण के सूबेदारों एवं निजाम तथा दिल्ली के बादशाह और पुर्तगालियों को हराया.
3. गुजरात को गायकवाड़ ग्वालियर को शिन्दे (सिन्धिया) – नागपुर को भोंसले, धार को पंवार, इन्दौर को होल्कर, सरदारों-के अधिन करके मराठा संघ बनाया.
4. दिल्ली, जाते हुए 1 लाख सैनिकों के बीच, यहॉं सैनिक छावनी मे लू लग जाने से इस पराक्रमी पेशवा का स्वर्गवास हआ।
5. ग्वालियर के सिंधिया सरदार ने यह समाधि का निर्माण कराया।

ग्राम राजघाट (कुकरा) यहा नर्मदा किनारे महात्मा गांधी जी की अस्थियो का विसर्जन किया गया था जिससे यह स्थान एक तीर्थ के रूप में जाना जाता हैं।
बावनगजा शुक्लेश्वर से लगभग पाँच किलोमिटर बड़वानी के पास सतपुड़ा की घनी पहाड़ियों में बावन गजा में भगवान पार्श्वनाथ की 84 फुट ऊँची मूर्ति हैं। यह एक जैन तीर्थ हैं। बावन गजा की पहाड़ी के ऊपर एक मन्दिर भी हैं। हिन्दुजन इसे दत्तात्रेय की पादुका कहते हैंं। जैन इसे मेघनाद और कुंभकर्ण की तपोभूमि मानते हैंं।

बैजनाथ मंदिर ककराघाट जिला अलीराजपुर वि.ख. सोण्डवा के ग्राम ककराना में नर्मदा नदी के तट पर एक प्राचीन बैजनाथ मंदिर हैं जो राजाओं के समय से बना हुऑ हैं तथा ककराना घाट तीर्थ स्थल हैं यहॉ पर अमावस्या एवं पूर्णिमा पर स्नान करने वाले भक्तगण स्थान के पश्चात इस मंदिर में दर्शन करते हैं। वर्तमान मे श्री रमेश गिरीजी महाराज इस मंदिर में पूजा-अर्चना एवं अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

अवधूत धाम नारायण कुटी धरमराय ईश्वरदासजी महाराज के द्वारा हर पूर्णिमा पर कार्यक्रम किये जाते हैं इस कारण आस-पास के क्षेत्र के निवासियों के लिए यह श्रद्धा का स्थान हैं तथा यहॉ परिक्रमावासियों के लिए सदाव्रत चलता हैं ।
कोटेश्वर कोटडा प्राचीन किवदंती के अनुसार कोटी तीर्थो के समान फल देने वाला स्थान माना गया हैं । यहॉ प्राचीन शिव मंदिर स्थित हैं । यह मेघनाथ की तपस्या स्थली भी हैं । यहॉ उरी नदी एवं बाघनी नदी का संगम स्थल भी हैं ।
बोधवड महादेव एकलबारा नर्मदा पुराण में इस स्थान का उल्लेख होने के कारण एवं यहॉ प्राचीन मंदिर दर्शनीय योग्य हैं| इसलिए यहा श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता हैं ।
मॉ नर्मदा मंदिर बड़दा नर्मदा पुराण में इस स्थान का उल्लेख होने के कारण यह स्थान प्रसिद्ध हैं ।
चीडी संगम शिव मंदिरकोठडा नर्मदा पुराण में इस स्थान का उल्लेख होने के कारण यह स्थान प्रसिद्ध हैं ।
बेठ संस्थान धरमपुरी धर्मराज युधिष्ठीर द्वारा बसायी गई विंध्यांचल व सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला के मध्य नर्मदा के मध्य टापू में शिव मंदिर का निर्माण करवाया गया हैं । रानी रूपमती यहॉ मॉ नर्मदा के दर्शन करने के पश्चात ही भोजन ग्रहण करती थी । श्रृद्धा का प्रमुख स्थान हैं ।
खलघाट घाट खलघाट यहा नर्मदा के किनारे सुंदर घाट बने हैं । एवं पोराणिक मंदिर होने के कारण विभिन्न पर्वो पर यहॉ मेलो का आयोजन होता हैं ।

नेमावर यह स्थान नर्मदा नदी का नाभि कुण्ड माना जाता हैं, यहॉ पर भगवान सिद्धेश्वर महादेव का प्राचीन मन्दिर स्थित हैं। मान्यता अनुसार एसा कहा जाता हैं, कि पाण्डु पुत्र भीम के द्वारा इस मन्दिर का मुख परिवर्तित कर दिया गया था। यह स्थान नर्मदा जी का पवित्र स्थान माना जाता हैं। यहॉ पर वर्ष में दो बार चैत माह व अश्विन माह की नवरात्रि में मेला लगता हैं।
धर्मेश्वर महादेव मन्दिर राजा धर्मेश्वर ने महादेव की तपस्या की इसके तत्पश्चात मन्दिर का निर्माण करवाया जो कि प्राचीन धर्मेश्वर महादेव मन्दिर के नाम से जाना जाता हैं।
सीता मन्दिर यह स्थान चौसठ योगिनी का प्राचीन मन्दिर हैं इसे लव-कुश की जन्म स्थली भी कहा जाता हैं यहा पर वाल्मीकी आश्रम भी स्थित हैं शिव रात्रि के समय यहा पर आठ दिन का मेला भी लगता हैं
नर्मदा धारा जी बडासुर तपोस्थली यह स्थान बडासुर की तपोस्थली हैं, यहॉ पर पवित्र धाराजी हैं, ऐसी मान्यता हैं, कि शिव जी का पवित्र शिवलिगं बनाकर विसर्जित किया गया था, आज भी इस स्थान में प्राकृतिक रूप में शिवलिंग का निर्माण होता हैं।
कवाडिया पहाड पाण्डु पुत्र भीम के द्वारा निर्मित
सीता समाधि स्थान सीता मंदिर से 5 कि.मी. दुरी पर सीता समाधि स्थल हैं प्राचीन मान्यता हैं कि उस स्थान पर सीता माता ने समाधि ली थी सीता समाधि स्थान के पास ही घोडा पछाड स्थान हैं जहा पर लव-कुश के द्वारा घोड़ा पकडा गया था|

दादाजी धूनी वाले यहां स्वामी शिवानंद जी महाराज ने कुछ वर्षों तक तपस्या की थी। इन्हें दादाजी धूनी वाले के नाम से भी जानते हैं। ग्राम छीपानेर में दादाजी धूनी वाले द्वारा जो धूनी प्रारंभ की गयी थी वह आज भी जीवित धूनी हैं। यहां एक भव्य धर्मशाला बनायी गयी हैं, जिसमें लगभग 500 श्रद्धालु ठहर सकते हैं।
नर्मदा जी मंदिर ग्राम सीलकंठ मुख्यालय से 15 किमी दूरी पर स्थित हैं। यहां पर स्वामी ब्रहमानंद जी उदासीन द्वारा मां नर्मदा जी का मंदिर एवं भव्य यज्ञशाला बनवाई गयी हैं। यहां प्रतिवर्ष निशुल्क कन्या विवाह का आयोजन किया जाता हैं। यहां पर परिक्रमावासियों के रूकने एवं भोजन की व्यवस्था भी हैं।
हंशेश्वर मंदिर ग्राम मंडी मुख्यालय से 08 किमी दूरी पर स्थित हैं। यहां पर मां नर्मदा मोड़ लेती हैं। जिससे मां का स्वरूप चंद्राकार दिखाई देता हैं। यहाँ पर जो मंदिर स्थित हैं, उस मंदिर को हंशेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता हैं। यहां पर मंदिर में एक गुफा हैं, उसमें पहले कई संत महात्माओं ने तपस्या की थी।
नीलकंठेश्वर मंदिर ग्राम नीलकंठ मुख्यालय नसरूल्लागंज से 10 किमी दूरी पर स्थित हैं। यहां पर मां नर्मदा और कोलार नदी का संगम स्थल हैं। यहां संगम तट पर नीलकंठेश्वर महादेव का मंदिर हैं। यहां शिवरात्रि पर यज्ञ होता हैं।
आंवलेश्वर महादेव मंदिर ग्राम आंवलीघाट मां विजासन धाम सलकनपुर से 09 किमी दूरी पर स्थित हैं। नर्मदा पुरान अनुसार पांडवों द्वारा 1200 वर्ष यहां रहे हैं तथा आंवलेश्वर मंदिर प्राचीन मंदिर हैं।
सूर्यकुण्ड बुदनी राज्यमार्ग क्र. 15 के समीप ग्राम हथनोरा से 1.5 किमी दूरी पर स्थित हैं| प्राचीन मान्यता अनुसार यहां पर भगवान सूर्यदेव ने तपस्या की थी। पांच रविवार सूर्योदय के पूर्व स्नान करने से कुष्ठ रोग से मुक्ति मिलती हैं।
गोलेश्वर मंदिर बुदनी राजमार्ग क्र 12 से 3 किमी की दूरी पर ग्राम ग्वाडिया में नदी के मध्य स्थित हैं। मान्यतानुसार मंदिर 100-110 वर्ष पूर्व से स्थापित हैं।यह स्थल संतों की समाधि स्थल हैं। समीप ही करूणाधाम आश्रम भी स्थापित हैं, जोकि परिक्रमावासियों को सदाव्रत का वितरण करता हैं।

भृगु क्षेत्र मंदाकिनी गंगा मॉ नर्मदा पुराण में यह स्थान भृगुक्षेत्र के नाम से वर्णित हैं, यहॉ पर ऋषि भृगु ने साधना की थी मंदाकिनी गंगा भी यहॉ पर प्रगट हुई और नर्मदा जी में उनका संगम हैं।
गरूणेश्वर तीर्थ पौराणिक कक्षाओं के अनुसार यहॉ पर पक्षीराज भगवान श्रीहरि के वाहन गरूण ने तपस्या की हैं और यही पर उन्हें जन्म -मृत्यु रूपी बंधन से मुक्त होने का साधन प्राप्त हुआ यहॉ पर अत्यन्त प्राचीन शिवालय हैं। जहाॅ अनेकों संतों ने साधना की हैं।
नारदेश्वर तीर्थ नारद मुनि की तपोस्थली जो की नारदेश्वर तीर्थ के नाम से जाना जाता हैं यहॉ पर स्वामी महेन्दानंद जी नारदेश्वर तीर्थ की पुनः स्थापना की हैं।
वामन तीर्थ बारना नदी के संगम स्थल पर वामन तीर्थ स्थित हैं,यहॉ प्राचीन शिवालय एवं प्रसिद्व आश्रम आज भी स्थित हैं।
पांडवद्वीप वर्णन हैं कि यहॉ पर पाण्डवों ने यज्ञ किया था यहॉ पर आज भी उस यज्ञ की भस्म मिलती हैं। तेदोनी नदी का संगम हैं।
मंगलेश्वर तीर्थ यह मंगलेश्वर तीर्थ श्रवण मुक्त कर देता हैं यहॉ पर परमहंस जी दूधाधारी जी, वापोली वाले गुरूजी जैसे अनेकों संतों ने साधना कर परमपद प्राप्त किया हैं।
केतु धाम नर्मदा पुराण के अनुसार इस तीर्थ में केतु ने श्राप मुक्त होने के लिये तपस्या की थी। यहॉ प्राचीन मंदिर स्थित हैं इसका वास्तविक नाम केतुधाम हैं।
विलकेश्वर तीर्थ यहॉ पर भगवान भोलेनाथ का विलकेश्वर तीर्थ आज भी स्थित हैं। यहॉ अनेकों जीवन मुक्त महात्माओं ने साधना की हैं।
राम जानकी मंदिर यहॉ लगभग 300 वर्ष पूर्व का रामजानकी मंदिर हैं, जहॉ संस्कृत विदयालय भी चलता हैं।
जनकेश्वर तीर्थ मॉ नर्मदा के प्रवाह के मध्य स्थित यह तीर्थ पुराणों में उल्लेखित हैं,यहॉ पर आज भी शिवजी का नर्मदा जल से स्वतः ही जलाभिषेक होता हैं।
पतई प्राचीन धरोहर एवं महात्मा संत साधु पुरूषों की तपो स्थान बहुत ही सुन्दर तीर्थ हैं। यहॉ हजारों महात्माओं ने तप किया हैं।

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