नर्मदा नदी का संरक्षण एवं संवर्धन - एक रणनीति

नर्मदा नदी केवल नदी मात्र ही नही अपितु आस्था व विश्वास का प्रतीक है, यह प्रदेशवासियों के लिए जीवनदायिनी नदी है, इसलिए इसके जल का निर्मल एवं अविरल बहते रहना अत्यंत आवश्यक है, इसका संरक्षण किया जाना जरूरी है। नर्मदा नदी का पौराणिक, आध्यात्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक महत्व होने के कारण इसके संरक्षण में सरकार के साथ-साथ संत और समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

नर्मदा नदी के संरक्षण में सरकार की अहम भूमिका है सरकार इस संबंध में नियम व कानून बना सकती है तथा उनका कड़ाई से पालन करवाने हेतु दंड आदि की व्यवस्था कर सकती है। प्रचलित नियमों तथा कानूनों की जानकारी समाज के सभी व्यक्तियों तक पहुंचाने एवं उनका पालन करवाने में समाज एवं स्वैच्छिक संगठनों की अहम भूमिका होती है। नर्मदा नदी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व होने के कारण नर्मदा नदी के संरक्षण हेतु लोगों को धार्मिक रूप से जागरूक करने में संतों एवं धार्मिक गुरूओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

नर्मदा नदी के संरक्षण में , समाज की भूमिका एवं भागीदारी से तात्पर्य है कि लोग स्वयं नर्मदा नदी के संरक्षण हेतु रणनीति का निर्धारण कर उसका क्रियान्वयन, अनुश्रवण एवं मूल्यांकन आपसी सहयोग से करें, जिससे उनमें अपनत्व एवं उत्तरदायित्व की भावना विकसित हो। नर्मदा नदी के संरक्षण कार्य में समाज की भूमिका सुनिश्चित करने हेतु नदी के किनारों के कस्बों और गांवों में नर्मदा नदी संरक्षण समितियों का गठन किये जाने की आवश्यकता है, जिसमें स्थानीय धार्मिक समूह, सामाजिक-आर्थिक समूह, व्यवसायी, जननेता, शिक्षक, चिकित्सक, स्वास्थ्य सेवक और स्वंयसेवी संस्थाओं व पंचायत और नगर परिषदों आदि के सदस्य सम्मिलित हों।

नर्मदा नदी को प्रदूषित करने वाले प्रमुख स्त्रोतों को निम्नानुसार छ: समूहों में विभक्त किया जा सकता है। नर्मदा नदी निम्नानुसार वर्णित स्त्रोतों में से किन गतिविधियों के कारण प्रदूषित हो रही है, उन कारणों को ज्ञात कर रोकथाम हेतु जिला अथवा स्थानीय स्तर पर सरकार, समाज तथा स्वैच्छिक संगठनों के साथ समेकित कार्ययोजना (Integrated Plan) का निर्धारण कर कार्यवाही करें

  • उद्योगों व कारखानों से निकलने वाला गंदा पानी/अपशिष्ट पदार्थ/केमिकल/भारी धातु (Heavy Metals) आदि नदी के पानी को गंदा व प्रदूषित करता है तथा नदी में रहने वाले जीव-जंतुओं व वनस्पतियों को नष्ट करता है। साथ ही नदी के पानी को लगातार स्वच्छ करने के लिए जिम्मेदार लाभकारी सूक्ष्म जीवों को भी नष्ट करता है।
  • अधिक ताप होने के कारण औद्योगिक बहाव, नदी का तापमान बढ़ता है जिससे पूरी ईकोलॉजी प्रभावित होती है। इस तरह के बहाव में भारी धातु (Heavy Metals) होते हैं, जो पानी के माध्यम से मनुष्य के शरीर में अंदर प्रवेश करते हैं और गंभीर बीमारियों को जन्म देते हैं।

  • घरों तथा गांव व शहरों के कचरे में भारी धातु(Heavy Metals) जैसे- लैड, क्रोमियम, आर्सेनिक, मरकरी पाई जाती है। यदि ऐसा व्यर्थ जल नदी के पानी में मिलेगा तथा यह जल शरीर में प्रवेश करेगा तो नदी जलीय जन्तुओं तथा वनस्पितयों के साथ-साथ मनुष्य को कई बीमारियों जैसे-लीवर, किडनी, हैजा, टायफाइड, तंत्रिका तंत्र तथा त्वचा से संबंधित रोग हो सकते हैं।
  • इस तरह के कचरे में साबुन व डिटर्जेंट आदि होते हैं, जिसमें पाये जाने वाले सोडियम और पोटिशियम शरीर को गंभीर क्षति पहुंचाते हैं।
  • घर तथा मनुष्य के उपयोग पश्चात् व्यर्थ जल नालों/धाराओं के माध्यम से नदी में मिलता है, जिसमें भारी धातु (Heavy Metals), लेड, क्रोमियम, आर्सेनिक, मरकरी, साबुन, डिटर्जेंट तथा मानव व पशु मल का मिश्रण होता है। यह नदी के जल को दूषित करने का प्रमुख कारक है।

  • पॉलीथीन अथवा प्लास्टिक का दैनिक जीवन में बेहताशा उपयोग करने से अत्याधिक मात्रा में प्रतिदिन गैर जैव अपघटनीय कचरा (Non-biodegredable waste ) का पैदा होना।
  • नदी के किनारे खुले में शौच करना।
  • नदी में नहाते वक्त साबुन व डिटर्जेंट का उपयोग करना।
  • नदी में कपड़े, बर्तन, वाहनों का धोना एवं पशुओं को नहलाना।
  • लाशों व मृत पशुओं को नदी में फेंक देना।
  • नदी के किनारे खाली भूमि को कचरा फेंकने की जगह (dumping yard) की तरह समझना।
  • मछलियों हेतु दानों का विक्रय प्लास्टिक की थैलियों में किया जाना तथा लोगों द्वारा मछलियों को दाना खिलाने के पश्चात खाली प्लास्टिक की थैलियों को नदी में फेंक देना।
  • मछली आदि पकड़ने के लिए पेस्टीसाईड का उपयोग करना जो बाद में नदी के पानी के माध्यम से जीव-जन्तुओं, पशुओं एवं मनुष्य के अन्दर प्रवेश करता है तथा शरीर को गंभीर क्षति पहुंचाता है।

  • धार्मिक त्यौहारों के समय रसायनों से बनी मूर्तियों का नदी में विसर्जन करना।
  • पूजन सामग्री नदी में फेंकना।
  • धार्मिक स्थलों, धर्मशाला, आश्रम व घाट पर कचरा तथा मानव मल-मूत्र त्याग करना ।
  • नदी के किनारे पुराने कपड़ों व चप्पलों को छोड़ने की प्रथा।
  • लोगों द्वारा नदी में अपनी आस्था व्यक्त करने हेतु सिक्के डालना।
  • आश्रमों का नर्मदा के बिल्कुल समीप स्थापित होना।
  • नदी के घाटों पर बच्चों का अथवा अंत्येष्टि के उपरांत मुंडन कराने की प्रथा।
  • नर्मदा नदी में अस्थि विसर्जन करने की प्रथा।
  • त्यौहारों/स्नान पर्वों के दौरान भारी मात्रा में लोगों का एकत्र होना तथा मल-मूत्र त्याग करने हेतु उचित व्यवस्था न होने के कारण नदियों के घाटों को गंदा करना।
  • त्यौहारों/ स्नान पर्वों के समय जन-सैलाब द्वारा कई प्रकार का कचरा जैसे- पॉलीथीन, पानी की बोतल, घरों में देवी देवताओं को चढ़ाई गई पूजन सामग्री, दोने पत्तल, फूल आदि नदी में प्रवाहित करना।
  • नदी में दीपदान करने की प्रथा वर्तमान में दीपदान प्लास्टिक के पात्र किया जा रहा है।
  • नर्मदा नदी के तट पर आरती के समय मनुष्यों द्वारा अपने साथ लाये सामान को छोड़ कर चले जाना।

  • नर्मदा नदी के घाटों पर प्रसाद साम्रगी बेचने वाले व्यवसायियों द्वारा नदी के जल को दूषित करना। प्लास्टिक/पन्नी के पात्रों में सामान बेचने से श्रद्धालुओं द्वारा उक्त प्लास्टिक/पन्नी के पात्रों को नदी में छोड़ दिया जाता है।
  • अविवेकपूर्ण तथा अत्यधिक मात्रा में नदी से रेत (नदी का फिल्टर) का निकाला जाना।

  • अत्यधिक मात्रा में रसायनिक उर्वरकों का उपयोग, अत्यधिक मात्रा में अविवेकपूर्ण कीटनाशकों/पेस्टीसाईड का उपयोग तथा सघनी फसलें (INTENSIVE CROPPING) - इन गतिविधियों के कारण हानिकारक रसायन रिसाव (leaching) व बहाव (run off) के माध्यम से नदी के पानी में जाते हैं और उसे जहरीला बनाते हैं, मृदा के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी जीव-जंतु एवं पौधे नष्ट हो जाते हैं तथा मृदा की उर्वरा शक्ति क्षीण हो जाती है, खेतों की मिट्टी कड़ी हो जाती है जिससे उसकी जलग्रहण क्षमता कम होती है तथा मिट्टी का कटाव बढ़ता है और रिसने से नदी में मिट्टी जमा होती है।
  • सिंचाई के लिए मुख्य रूप से नदियों पर निर्भरता जिसके कारण जल का अपव्याव के साथ-साथ खेतों की मिट्टी तथा कीटनाशक पदार्थों का नदी में मिलना तथा नदी के जल को प्रदूषित करना।
  • डम्पिंग ऑफ फार्म एण्ड एनीमल वेस्ट - ग्राम में घरों व खेतों से निकले कचरे तथा पशुओं के गोबर आदि को जगह-जगह फेंक देना।
  • खेतों/फसलों के अवशेष व कचरे में आग लगाना।
  • कृषि वानिकी का अभाव।
  • नदी के वृक्षहीन तट।
  • खेतों से मेढ़ों की समाप्ति।

  • उपरोक्त कारणों से नदी को होने वाली हानि व खतरों से स्थानीय लोगों को अवगत कराते हुये उन्हें सचेत करें।
  • उद्योगपतियों से उपचार हेतु निवेदन करें।
  • स्थानीय स्तर पर कार्यपालिक मजिस्ट्रेट को अवगत करायें।
  • स्थानीय निकायों जैसे- ग्राम पंचायत, नगर पंचायत, नगर पालिका और नगर निगम से उपचार हेतु अनुरोध करें।
  • नदी के किनारे खुले में लोगों को शौच न करने की सलाह दें व इससे होने वाले खतरों से लोगों को सचेत करें तथा ऐसा न करने के लिये लोगों को प्रेरित करें। हर घर में अथवा हर गांव में समुदाय आधारित शौचालयों की स्थापना करवाकर उसे ऊर्जा उत्पादन से लिंक किया जावे।
  • लाशों को नदी में फेंकने की कोई भी धर्म अनुमति नहीं देता। अतः इस दिशा में धार्मिक गुरुओं के माध्यम से स्थानीय लोगों को अवगत कराया जाये। मृत पशुओं का भी व्यवसायिक उपयोग हो सकता है। पशुओं के वैज्ञानिक निष्पादन हेतु ग्राम व नगर पंचायत स्तर पर यूनिट स्थापना की दिशा में पहल।
  • नर्मदा नदी की सीमाओं का सम्मायन कर अतिक्रमण हटाने की ओर पहल।
  • मछलियों हेतु दोंनो का विक्रय प्लास्टिक की थैलियों में किये जाने पर रोक हेतु कार्यवाही करना तथा मछली आदि पकड़ने के लिए पेस्टीसाईड का उपयोग न करने के लिए लोगों को इसके दुष्परिणामों के सम्बन्ध में जागरूक कर प्रेरित करना तथा कानूनी पहल करना।
  • नदी के किनारे पृथक से विसर्जन स्थल हेतु पहल। तेरा तुझको अर्पण के आधार पर मूर्तियों के निर्माण में स्थानीय शिल्पकारों की पर्यावरणीय क्षमतावृद्धि करना।
  • धार्मिक स्थलों, धर्मशाला, आश्रम व घाट पर कचरा तथा मानव मल का नर्मदा नदी में प्रवाह न हो इस हेतु हर संभव समझाईश तथा कानूनी पहल करना।
  • नदी के किनारे पुराने कपड़ों व चप्पलों को छोड़ने की प्रथाओं, जो नदी को दूषित करती हों, के सबंध में धार्मिक गुरुओं आदि के माध्यम से श्रद्धालुओं को जागरूक कर ऐसा न करने के लिए प्रेरित करना। जिन लोगों के घर पानी की व्यवस्था नही है उनके यहां व्यवस्था करना।
  • नदी में अपनी आस्था व्यक्त करने हेतु सिक्के आदि डालने की प्रथा पर वैज्ञानिक दृष्टि से चिंतन।
  • नदी के घाटों पर मुंडन कराने के बाद निकले बालों को स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से एकत्र कर एमगिरि (महात्मा गांधी ग्रामीण औद्योगिकीकरण संस्थान) की तर्ज पर हेयरामृत बनाने हेतु इकाई की स्थापना की पहल।
  • नर्मदा नदी में अस्थि विसर्जन हेतु समाज तथा स्थानीय स्वैच्छिक संगठनों द्वारा ग्राम पंचायत, नगर पंचायत, नगर पालिका, नगर निगम के माध्यम से अलग कुंड का निर्माण कराने हेतु पहल।
  • स्वैच्छिक संगठनों द्वारा समाज के सहयोग से त्यौहारों/स्नान पर्वों के दौरान भारी मात्रा में एकत्र हुए लोगों हेतु मल-मूत्र त्याग करने के लिए अस्थाई शौचालयों की व्यवस्था की जाये। नर्मदा नदी के संरक्षण के उपायों तथा जनता को समझाईस व अपील कर जागरूक कर सक्रिय बनाएं।
  • लोगों को जागरूक करने के लिए घाटों तथा महत्वपूर्ण स्थानों पर स्क्रीन लगवाना, जो सोलर ऊर्जा आधारित हो और रात्रि के समय जनता का ध्यान आकर्षित कर सकें।
  • गांव व कस्बों के सीवर ढोने वाले नालों को नर्मदा में जाने देने की बजाय गंदगी बहाने की जगह दफनाने का सिद्धांत अपनायें तथा मानव मल से DRDE (DEFENCE RESEARCH & DEVELOPMENT ESTABLISHMENT) ग्वालियर द्वारा ऊर्जा उत्पादन (METHANE GENERATION) यूनिट स्थापित करने की आवश्यकता।
  • पॉलीथीन अथवा प्लास्टिक की थैलियों को नदी में न फेंकने हेतु लोगों को प्रेरित करें।
  • स्वैच्छिक संगठन समाज के सहयोग से धार्मिक स्थलों पर कचरा एकत्र करने हेतु जगह-जगह पर डस्टबिन रखवायें तथा उनमें एकत्र होने वाले जैव अपघटनीय (biodegredable) कचरे से खाद तथा ऊर्जा उत्पादन (Methane farming unit) की स्थापना की दिशा में कैट इंदौर और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र मुंबई मॉडल (CAT indore & BARC Mumbai Model) के अनुसार पहल करें तथा गैर जैव अपघटनीय कचरा प्रबंधन (Non-biodegredable waste Management) यूनिट की स्थापना हेतु भोपाल स्थित सार्थक स्वयंसेवी संगठन द्वारा किये गये कार्य का अनुसरण करें।
  • पुजारी/संत श्रद्धालुओं से प्लास्टिक के पात्र में दीपदान न करने हेतु अपील करें तथा स्वैच्छिक संगठन प्रशासन के सहयोग से प्लास्टिक के पात्रों में दीपदान करने हेतु रोक लगाने का प्रयास करें। साथ ही स्वैच्छिक संगठन समाज के सहयोग से दीप के साथ नदी में प्रवाहित पलाश आदि के पत्तों को जाल लगाकर एकत्र कर पुनचर्क्रीकरण(Recycling) हेतु पहल करें।
  • नर्मदा नदी के तट पर आरती के दौरान संतों/पुजारियों द्वारा लोगों से नर्मदा नदी के जल को पवित्र, निर्मल एवं अविरल बनाएं रखने की अपील की जाये।
  • स्वैच्छिक संगठन नदी किनारे/घाटों/धार्मिक स्थलों/धर्मशालाओं के किनारे विक्रेताओं से अनुरोध करें कि पॉलीथीन तथा प्लास्टिक में पूजा सामग्री को न बेचें।
  • स्वैच्छिक संगठनों द्वारा उक्त स्थानों पर श्रद्धालुओं की समझ बढ़ाने के लिये बोर्ड लगवाना।
  • स्थानीय स्तर पर मजिस्ट्रेट के माध्यम से ऐसे स्थानों को पॉलीथीन मुक्त क्षेत्र घोषित करवाना।
  • नर्मदा के किनारे के जिले में प्लास्टिक को पूर्णतः प्रतिबंधित करना।
  • अत्यधिक मात्रा में रेत खननकर्ताओं को भी नर्मदा नदी के प्रति अपने दायित्वों का बोध कराना।
  • संतों द्वारा किनारे पर नर्मदा के पौराणिक एवं आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित करते हुये सप्ताह में एक दिन नर्मदा नदी के किनारे पर ही समूह चर्चा का आयोजन।
  • मृदा उपचार हेतु रसायनों के उपयोग से होने वाले दुष्परिणामों एवं जैविक कृषि के लाभ, महत्व तथा उपयोगिता के संबंध में स्वैच्छिक संगठनों एवं सरकार के माध्यम से प्रचार - प्रसार तथा जैविक कृषि को प्रोत्साहन।
  • स्वैच्छिक संगठनों एवं सरकार के माध्यम से कीटनाशकों/पेस्टीसाईड के उपयोग से होने वाले दुष्परिणामों के विषय में जन-जागरण कर गौ-वंश आधारित कृषि अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना।
  • एकल कृषि पद्धति के स्थान पर समन्वित खेती ( INTEGRATED FARMING) जैसे उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण, पशुपालन, मधुमक्खी पालन, मीथेन फार्मिंग, रेशम कीट पालन, मूल्य संवर्धन इत्यादि को अपनाना।
  • जल के व्यर्थ एवं अविवेक पूर्ण उपयोग पर नियंत्रण। सिंचाई के लिए उन्नत युक्तियों जैसे- ड्रिप, स्प्रींकलर, रेनगन आदि के वृहद स्तर पर उपयोग को बढ़ावा तथा फसलों की कम पानी मांग वाली जातियों का विकास और इनका प्रचार-प्रसार करना।
  • अप्रवाहित होने वाले वर्षा जल को संरक्षित कर भण्डारित करने के प्रकल्पों पर ठोस नियोजन के साथ मिशन के रूप में सार्थक जमीनी कार्यवाही, भूमि में वर्षा जल के अधिकाधिक निश्चयन की विधाओं को बढ़ाना देना।
  • जल बजट(Water Budgeting) तथा जल नीति का निर्धारण कर क्रियान्व‍यन करना।
  • जल के महत्व, आवश्यकता और उपयोगिता पर जन-जागरूकता। शहरी जनता में भी जल का महत्व , घटती उपलब्धता और भविष्य में होने वाले संकट के प्रति आगाह करते हुए जागरूकता सन्निर्माण।
  • ग्राम में जगह-जगह फेंके हुए घरों व खेतों से निकले कचरे तथा पशुओं के गोबर आदि को एकत्र कर जैविक खाद तैयार करने हेतु यूनिट/नाडेप/भू-नाडेप की स्थापना।
  • कृषि से की उत्पन्न होने वाले कचरे से प्रत्येक ग्राम पंचायत में बायोगैस (मीथेन गैस) एवं जैविक खाद पैदा करने यूनिट की स्थापना।
  • प्रत्येक ग्राम पंचायत में पंचगव्य व जैविक कीटनाशक आदि बनाने हेतु लघु यूनिट की स्थापना।
  • प्रत्येक ग्राम पंचायत में फसलों की कटाई के पश्चात नरवाई व कचरे में आग न लगाने हेतु समाज को सचेत करना।
  • यथा-स्थान नमी संरक्षण (In-Situ Moisture Conservation) की छोटी-छोटी कम लागत वाली विधाओं को बढ़ावा।
  • गांव की पड़त एवं बेकार भूमि, खेतों की मेढ़ों पर तथा खेतों के बीच कृषि उपयोगी, ईंधन के काम में आने वाले, फलदायी तथा अन्य उपयोगी वृक्षों को लगाया जाये।
  • नर्मदा नदी के किनारे तथा खेतों के बीच जमीन पर अधिक वानस्पतिक आच्छादन (Vegetative Cover) को बढ़ावा - फलीय, कृषि वानिकी, बहुवर्षीय घास, औषधीय व सुगंधीय पौधे रोपित करना।
  • नदी के किनारों पर शासकीय अथवा पड़त भूमि में ऐसे वृक्षों का रोपण जिनकी पत्तियां चौडी हो तथा जिनकी पत्तियों का उपयोग दोने/दीपदान हेतु पात्र/दोने आदि बनाने में किया जा सके।
  • प्रत्येक जिले में स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से एक टोल फ्री नम्बर संचालित करना जिसके माध्यम से समाज/श्रद्धालुओं/लोगों को किसी भी समय चाही गई जानकारी प्राप्त हो सके।
  • नदी के किनारे रहने वाले ऐसे परिवारों की पहचान जिनके घर पर पानी की सुविधा नहीं हैं तथा दैनिक कार्यों हेतु पूर्णत नर्मदा पर निर्भर हैं उनके घरों में पानी की व्यवस्था जिससे उनके दैनिक कार्यों से नदी को होने वाले प्रदूषण से बचाया जा सके ।
  • नदी को गंदा करने वाले व्यक्तियों को स्थानीय निकायों एवं प्रशासन द्वारा स्थान पर ही दण्डित किये जाने का प्रावधान

उपरोक्त गतिविधियों के अतिरिक्त स्थानीय आवश्यकताओं तथा परिस्थितिओं के अनुसार अन्य नवाचार भी किये जा सकते हैं। नर्मदा नदी के संरक्षण कार्य की तर्ज पर उसकी सहायक नदियों का भी शुद्धिकरण एवं संरक्षण करें।

आकल्पन उमेश शर्मा, कार्यपालक निदेशक, जन अभियान परिषद्

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